रे पंछी तू क्यों उडता है
प्रभा जैन
र्घणा का बांध मन को
रिश्तों से भेद रहा
जो अपने थे अपनों को ही लील रहा
सागर छलक कर मिटट्री से
बने घर को तोड रहा
निश्चल वो मिटट्री
स्वंय को फिर तैयारकर लेती है
किसी और घर के निमार्ण में।
नन्हां स पौधा
अपने ही पतों सेलिपटा
आनंदित होकर पेड बन रहा।
मन की कटुता तेज धार ज्यों
व्यवहार मे कालिमा बन
कलंकित अंधकार बन
शब्दों के डंक मार रहा।
मन पंछी बन
गगन में लम्बी उडान
भरता जाता है
छोटा सा तन मन के भेद
न पाकर बेसुध हो जाता है।
नन्हीं देह को मन के जाले
धेरते जाते हैं
हजारों चाबुक में
नंगी देह घायल हो जाती है
क्यूं मन पंछी बन जाता है
रे पंछी तु क्यूं उडता है।
16(311 शास्त्री नगर
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