शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

re panchi


रे पंछी तू क्‍यों उडता है
प्रभा जैन
र्घणा का बांध मन को
रिश्‍तों से भेद रहा
जो अपने थे अपनों को ही लील रहा
सागर छलक कर मिटट्री से
बने घर को तोड रहा
निश्‍चल वो मिटट्री
स्‍वंय को फिर तैयारकर लेती है
किसी और घर के निमार्ण में।
नन्‍हां स पौधा
अपने ही पतों सेलिपटा
आनंदित होकर पेड बन रहा।
मन की कटुता तेज धार ज्‍यों
व्‍यवहार मे कालिमा बन
कलंकित अंधकार बन
शब्‍दों के डंक मार रहा।
मन पंछी बन
गगन में लम्‍बी उडान
भरता जाता है
छोटा सा तन मन के भेद
न पाकर बेसुध हो जाता है।
नन्‍हीं देह को मन के जाले
धेरते जाते हैं
हजारों चाबुक में
नंगी देह घायल हो जाती है
क्‍यूं मन पंछी बन जाता है
रे पंछी तु क्‍यूं उडता है।
16(311 शास्‍त्री नगर
  

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