मनुष्य एक सोचने वाला प्राणी है
प्रभा जैन
सोचना आम प्रक्रया है।मनुष्य जाती के सब लोग सोचते हैं ।दूध पीता बच्चा भी सोचता है।स्कूल जाने वाला विधार्थी भी सोचता है।सोच का इतना दोहन होता है कि सोच स्वंय सेाच में पड जाती है। व्यवहारिक ज्ञान को सोच कर परिक्षा उर्तीण करना आम बात नहीं वो प्रशसनीय है कामयाबी है।
घर में महिला भी सोचती है।खाना बनाने से लेकर दूध सब्जी बाजार से कब कैसेट लाना है उसे भी सोच की कार्यपेटी में रखा गया है। बच्चे को स्कूल भेजना है ड्रेस को आईरन करनी है टिफिन बोटल तैयार करना है। यह सब बिना सोचे कैसेट संभव है ।परिपोषित संस्क्रति में सोच की अपनी अवस्था हैजिसे निर्वाह के तौर पर शिक्षित किया जा सकता है।कालखण्ड का कोई भी अध्याय सोच की गणित पर चुनौतीपूर्ण जोड घटाव लिखने में कामयाबी हासिल कर सकता है।
कुछ लोगों की सोच तो ऐसी पुरस्क्रत सफलता है जिस पर भाषण गढे जा सकते हैं।दार्शनिकों वैज्ञानिकों की सोच पर सफल जिन्दगी का शक्ति शाली हासिल आयाम तय किया गया है। उन्हीं के तार्किक अध्यनों में निवेश की प्रतिराशी संलंग्न होकर मनोविज्ञान के धूमिल दायरे में बंद नजर आती है। सदगुणेां का समावेश् किसी भी आधार पर व्यक्तिगत राय देने में महारथ सिद्ध है। सिद्ध पुरूष की सोच की छैनी जब वचन बद्धता पर आरूढ होकर अति आधुनिक विचारों की गुणवता को साबित करने पर उतारू हो जायेगा तब मनुष्य की प्रक्रिति पर प्रहार होना आवश्यक हो जाता है कि क्या वास्तव में वो सोचने वाला प्राणी है।
वादकों व अनुवादकों को पीपल के पते पर अपना धैर्य छपवाने की दोहरी मांग संभवतया करनी होती है। सडक पर पैदल चलिए या कार की सवारी करें। जरूरी है नैतिकता को बनाये रखने की। मुख में पान चबाने की सामान्य प्रक्रिया पर क्या व क्युंकर सवाल उठे। अपने पैसे से हम कुछ भी सेवन कर सकते हैं। पान की पीक सरकारी खाते की जमीन पर इत उत गिराकर गंदगी को न्योता देना भी सही है क्योंकि यदि वे थूकेगें नहीं तो म्यूनिसीपालिटी वालों के काम कम न हों जायें। गरीब मजदूरों को सफाई करने के कुछ पैसे घर चलाने के लिए कहां से प्राप्त होंगे। बच्चों के हाथों में जंक फूड देकर उनकी करारी भूख क्यों न शांत करें रेपर ही तो फेंका है। सरकार के हाथ में भी काम की कुछ लकीर तो डालनी ही पड्रेगी ।दिन भर गंदगी फैलाते मनुष्य प्रजाती के सोचनीय प्राणी को क्या पता ठिठुरती ठंडी रात में भी मजदूर के हिस्से सिर्फ आपकी गंदगी साफ करनी आती है। उन्हें मुलायम नर्म गददे व रजाई नहीं मिलती ।सुबह का चुल्हा जले इसके लिए रातभर सोचनीय कार्य को अंजाम तक पहुंचाना होता है। अनैतिक कारणों का दोषी लेक्चरों की दुनिया का बादशाह बनकर शब्दों के मार्मिक जाल से असफल उपलब्धियों को अपनी सोच की दिशा से अनभिज्ञ परिस्थितियों को स्वेच्छानुसार आयाम देने की कोशिश् करता है। आप गारंटी के साथ उनके होकर चलिए कुछ ही महिनों में आपकी सोच का ब्रेन वाश् हो जायेगा और आप ग्रहस्थ की हर समस्या से मुक्त होकर या तो अपनी तिजोरी का मुख उनकी तरुफ खोल देंगे या उन्हीं के हवाले राम नाम सत्य की श्रेणी में अपना नाम दर्ज करवा चूके होंगें ।स्वसंतुस्टी से काम बनाने की हर मुमकिन कोशिश् को प्रसिद्धि के लिए मीडिया टायकून का कंधा बिना मांगे ही मिल जाता है।
सहेजकर सोचकर सोचनीय अवस्था को क्या मनुज सोच पाने की स्थिति में है। वो सोचकर भी सोच नहीं पाता या उसकी सोच दयनीय व विचारनीय होकर गमगीन हो चली है1 ऐसी आदरणीय सोच का तो सदियों तक इलाज भी चलता रहेगा तब भी सोच की सोचनीय अवस्था को मुक्ति असंभव है। हम निकलते हैं उनकी तलाश में जो अपनी सोच को वैधानिक पुष्टि पर आम व्यक्ति की निखरती जिंदगी में लागू करें। देखते हैं तलाश जारी है उस एक सोच की जिसके लिए हमने आपने व सबने सोचकर भी सोचना बंद कर दिया। सोच को हमें फिर से पुष्टी देनी है। कि क्या वास्तव में मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी की भूमिका में आराम से आ सकता है या उसके चिंतन को दीमक लग गया है। सेाचनीय अवस्था का जरिया किस सोच से प्राप्त होगा। अधेडबुन की किसी भी अवस्था में आप और हम सोचना चालू रख सकते हैं। बशर्ते कि वो कोई खजाने से निकली हुई कोई गहरी सोच हो जिसका प्ररूपण करने मनन करने सोच को भी सोचना
bahut hi badiya v umda rachna hai keep it up
जवाब देंहटाएंnishank