प्रेममय सवाल
प्रभा जैन
मिले जुले भावों का परिसीमन प्रेम हो नहीं सकता। प्रेम करने के लिए शुद्ध भावों की आवश्यकता है शुद्ध भाव मिल भी जायेगा तो क्या प्रेम के लिए शुद्ध पात्र भी तो चाहिए। शुद्ध पात्र में शुद्ध भाव किस कदर टिक सकते हैं ये भी तो सवाल है। सवालों के पास तो एक सवाल अब भी है----
शुद्ध प्रेम के लिए शुद्ध लडकी या लडका भी तो शुद्ध चाहिए अब उनकी शुद्धता किस आधर पर किस पेरामिटर से नापा जायेगा। क्या शुद्धता का पैमाना किसी सात्विक भाव से संत्रास्त होकर किसी की शु8िकरण के लिए कुछ कर सकने में महारथ हासिल कर सकता है। प्रेम के लिए पात्रता का विकास करना जितना आवश्यक माना गया है उतना ही उसकी स्वच्छता पर ध्यान देना भी आवश्यक अंग बन गया है। एक पल के भाव क्या वाकई पूरी जिन्दगी तक कायम पह सकते हैं। या उन भावों को समय समय पर संवेदनात्मक क्रिया प्रतिक्रिया की कसौटी पर चढ जाना चाहिए। बदलाव व बहलाव के इस मौसम में बहकाव व भटकाव की स्थिति की यथावत बनी रहती है। ऐसी गंभीर परिस्थितियों से जूझने के लिए ठहराव की अत्यंत आवश्यकता होती है। गर किसी के पास ठहराव का पात्र न हो तो बाकी स्थितियां गंभीर से गभीर बनकर छिटक लेगी। दोषारोपण बेवफाई का होगा सो अलग। क्यूंकर ऐसी स्थितियों को जन्म मिले।
यंत्रणा व मंत्रणा किसी संभवत: जानकारी पर किया जा सकता है। त्रासदी तो मंत्रणा की है कि जो होती ही नहीं । अमूमन फैसला एकतरफा कर दिया जाता है। एक अकेला पात्र दोषी करार दिया गया और काल कोठरी की यंत्रण में घुटन व सिलन की जिन्दगी को बसर करने के लिए मजबूर कर दिया गया। मंत्रणा दोनों तरफ से हो भी जायेगा तो क्या अहम पर ठोस पहुंचने की गुंजाईश न होगी। क्यूंकर इन स्थितियों का सामना अकेला एक पात्र झेलता है।
भाव शून्य कगार पर मरघट का वास होता है ये तो तय होगया। अब बात फिर शुद्धता की लें तो क्या बुराई है। शुद्ध पात्र शुद्ध दानी शुद्ध भाव शुद्ध विचार सभी शुद्ध तो अशुद्धी कहां से आयी। क्या विचार और भाव वक्त की झंझावतों में फंसकर बदल गये। अथवा सहनशकित का दायरा संकुचित हो गया। एक बात ओर आती है प्रेम के परिहास में नवीनता के मुखौटे के पीछे कई राज दफन होते हैं । धीरे धीरे पुरात्व का खजाना ज्वार ले आता है।जो शुरूवाती दौर में अच्छे लहजे में चल रहा होता है वही अब बेरूखी का आर होने लगा है। जो अदायें मदहोशी व बेहोश् करने वाली मानी जाती थी वही बचकानी व बेफकूफी के लहजे में शामिल हो गयी है। बातों का सिलसिला रस घेाला करता था या दवा के रूप में काम लिया जाता था अब वही शुद्ध पात्र अशुद्ध हो गया है जहर का काम करने लगा है। अम्रत वचनों का जहरीले वाणें में परिवर्तित होता देख प्रेम का हुजुम स्वंय शर्मशार है। शर्मनाक लहजे को किस पात्र की शुद्धता का उदाहरण दिया जाय । आंचलिक स्थितियों का जमावडा किसी चौपाल या नुक्कउ पर जमघट नहीं लगाता उससे आगे किसी ओर के दामन में गिरकर स्वंय को सरोबार करता है।
भीगे दामन पर कालिख के छींटे भी नजर के टीके का काम करती है। भंवरे की तरह फुलों की मासूमियत चुराना अब शुद्ध पात्र का आवरण बन गया है। भावों का दायरा किस कोने से किस कोने तक अपने भाव प्रदर्शित कर सकने में महारथ् हासिल करता है ये तो वक्त तय करेगा । त्रप्त प्रेम की पवित्रता शुद्धता की कसौटी पर ताउम्र खरी उतरती है। आंतरिक प्रेम की कशिश अंतत* बनी रहती है वरना वहीं समझोते की दीवार भी जल्दी बन जाने में अपने आप को साबित करने में लगी रहती है। लगाव का भेद आज पात्र की पात्रता पर नहीं कसा जा सकता। हालातों के हत्थे चएकर गलत फहमियों के हवाले होता है। वहां भावनाएं खत्म और अहम्र की पदवी उँची हो जाती है।
प्रेम का पात्र आज भी सच्चे प्रेम के इंतजार में अपने आप को दोषी माने अश्रु बहा रहा है। विनती करता है पर क्या माफी भी मिल पायेगी उसे। सूली पर लटका वो प्रेम कराह रहा है जिसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं । अब रहमत और प्रेम का हुजुम किस कदर अपने लिए पात्र को शुद्ध कर पाता है। ये भी प्रेम मय सवाल है।
प्रभा जैन
16;)311 शास्त्री नगर
खटोदराकालोनी
सूरत-2
9723544153
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