मंगलवार, 22 नवंबर 2011

ak sawal kanwarepan ka lekh


एक सवाल कंवारेपन का
प्रभा जैन
प्रेम ढाई अक्षरों से बना जरूर है किन्‍तु इस शब्‍द की कोइ्र भाषा या परिभाषा ही नहीं होती। प्रेम स्‍वंय में पूर्ण होता है यह कब होता है।किससे होता है ।क्‍यूं होता है।समझ से परे है।इंसान उसे महसूस कर सकते हैं पर इसकी गहराई को हर मनुष्‍य समझ ही नहीं पाते। प्रेम आज मात्र एक अभिव्‍यकित बन कर रह गया है किन्‍तु उस अहसास को महसूस करने की क्षमता खामोश हो गयी है। समस्‍या का समाधान मात्र प्रेम है। प्रेम जीवन का समर्पण है जहां चाह नहीं होती पाने की सिर्फ देने के अहसास से प्रेम परिपूर्ण होता है। प्रेम मूक संवेदना है जो मौन आंखो के सहारे कब दिल तक पहुंचता है पता ही नहीं चलता।
                     प्रेम में प्रेमी की अंतिम मंजिल शादी तय कर दी गयी है।कुछ तो समाज के सारे बंधन तोड कर विवाह के सूत्र में बंधने के लिए घर से भा्र कर शादी कर लेते हैं। कहा जाता है कि प्‍यार किया तो डरना क्‍या परन्‍तु जब प्रेम होता है तो दूनिया से बेखबरी भले हो मन का कोना डरता है कि साथी बदनाम न हो जाये। प्रेम सांसो से उतर कर धडकन से रूह तक का सफर तय करता है तब कहीं जा कर रोम रोम में प्रेम की धारा बहती है।दिल की चाह होने लगती है कि अपने प्‍यार के पास रहे उसकी बाहों में पनाहो में जहां न दर्द सताये न कोई परेशानी ।प्रेम के होने में आंखो ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। दुनिया में इंसान ने तरक्‍की तो काफी कर ली परन्‍तु प्रेम के क्षेत्र में उसकी मानसिकता काफी संकीर्ण है क्रष्‍ण राधा के प्रेम को पूजेगें किन्‍तु उनके घर में यदि किसी ने प्रेम कर लिया तो सहनशक्ति की सारी हदें खत्‍म। हमारे समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जो विवाह किये बिना ही अपना जीवन जी रहे हैं। अविवाहित होन के कई कारण सामने आते हैं दाम्‍पत्‍य जीवन में कई बार ऐसा होता है कि दायित्‍व तले भावनाऐं दबकर दम तोड देती है।प्रेम की निष्‍पति या उत्‍पति तो संभवत: सामने वालों की समझ पर टिका है। क्‍या विवाहित व्‍यक्ति का संम्‍पूर्ण जीवन प्रेम मय होता है वादों कसमों को ही प्रेम का नाम देकर व्‍यवस्‍था को बनाये रखने में अपनी भूमिका रखते हैं। कई कहते हैं सच्‍चा प्‍यार मिले तो किसी भी उम्र में किया जाना चाहिए। प्रेम कोई शर्त नहीं व्‍यवस्‍था नहीं किन्‍तु विवाह शर्त और व्‍यवस्‍था है। इश्‍वर के कणकण में होने का अहसास होता है तो प्रेम भीकहीं भी पैदा होने का हक रखता है।राकेश कहता है कि प्‍यार एक खुमार है मैं जिससे प्रेम करता था उसके घरवालों ने उसकी शादी किसी और से कर दी पर मरा प्‍यार तो खत्‍म नहीं हुआ।जिस प्रकार ईश्‍वर को अनेक लोग चाहते हैं मानते हैं वैसे ही मैं भी चाहता हूं उसे वो किसी और की हो गयी ये सोच कर खत्‍म हो जायेगा मेरा प्‍यार तो क्‍या किया प्‍यार मैनें। उसकी यादों के सहारे पूरी जिन्‍दगी जी लुंगा। जीवन का कहना है कि अविवाहित हूं कुछ जरूरतें भी होती हे लेकिन जब वो ऐक्‍सीडेन्‍ट में चली गयी मुझे अकेला छोडकर तब से कोई ओर दिल को भाई ही नहीं। रागिनी की यादों का साथ काफी है। क्‍या ऐसे प्रेम का कोई सानी हो सकता है। रोमा कहती है जब पहली बार प्‍यार किया तो घरवालों ने मिलने नहीं दिया शादी के बाद पति से प्‍यार मिला नहीं ।पति के दोस्‍त से प्‍यार किया तो वो भी छोड गया अपनी मजबूरियों के साथ। फिर कोई और दिल को अच्‍छा लगने लगा तो उससे प्‍यार कर बैठी उसका ख्‍याल रखना अच्‍छा लगता है ।शादी शुदा होने के कारण अपनी मर्यादा को जानती हूं पर मन गर किसी को चाहे तो क्‍या कसूर। प्रेम ही तो है मन को सुकुन मिलता है कि कोई अपना है। हां ये सच है कि पहला प्‍यार नहीं मिलता ।मगर कभी भी अपना कोई दिल समझता है तो प्रेम अहसास बनकर जी उठता है।
                    रवि कहता है प्रेम कोई परी के आंचल पे लिखी कविता हैऐसी परी जिसे देखते ही प्‍यार हो जाये। पर न परी मिली न मौका ।घर में बडा होने के कारण जिम्‍मेदारियों से ही शादी कर ली अब अविवाहित होने का बस अफसोस भर होता है1रंजीत कहता है 7भाई बहन में सबसे छोटा था मां  पिता के मरने के बाद किसी ने ध्‍यान न दिया और अब उम्र हो गयी ।कोई मिली नहीं। बस रह गया कंवारा। राहुल का कथन है लडकियां आजकल है ही कहां सब पढी लिखी हो गयी है उनको उसी के लायक लडका चाहिए। कम पढे लडके रह जाते है कंवारे। दक्षा कहती है शादी करने से अच्‍छा है किसी की हत्‍या करके कंवारा रहना। ये शादी शुदा की राय हे शादी के बाद सिर्फ जिम्‍मदारी हेाती है प्रेम नहीं।प्रेम शून्‍य जीवन का कोई अस्तित्‍व नहीं रहता। रूनी कहती है प्रेम पुरूष से करना ही नहीं चाहिए।पुरूष प्रेम को समझना ही नहीं चाहता उसके लिए नारी सिर्फ भेग की वस्‍तु है। पुरूष क्रूर है चाहे पिता हो पति हो बेटा हेा या प्रेमी। मद्रों को प्रेम करना आता ही नहीं। जहां देह का प्रश्‍न है वहां पुरूष की नजर में प्रेम होता है अन्‍यथा जब दर्द मे उसके कंधे पे सिर रखना चाहें जो झटक देते हैं।क्रूर पुरूष से प्रेम करने के बजाय किसी पशु से या फूल से प्रेम करे तो प्रेम में अहसास मिलता हे। अविवाहित रहना अच्‍छा है किसी पुरूष को पति रूप देकर प्रेम में हारना। वरना प्राक्रतिक संपदाये क्‍या कम हैप्रेम करने के लिए । प्रीति कहती है प्रेम धरती के अंदर की वो भावना है जो सदा ही अंकुरित होकर खिलती है महकती है जीती है। फिर शादी ---- नहीं प्रेम सिर्फ प्रेम हैशादी उसका पडाव नहीं वो तो अंतिम छोर है।मैं तो अभी जीना चाहती हूं मेरा प्रेमी भी मेरे साथ जीता है। हम अविवाहित रहकर ही प्रेम को प्राप्‍त कर सकते हैं।जहां न बंधन है न ही दायित्‍व। रेशमी कहती है मैनें सदा ही मर्दों को कुचलते देखा है औरतों के जज्‍बातों को उनकी खुशियों को सदेव ही रोंदा है।क्रूरता की हर सीमा पार कर दी मर्दों ने।उनके नाम से ही घ्रणा के भाव मन को घेर लेते हें। अरूणा के अनुसार प्रेम मरीचिका है खुबसुरत धोखा है। शादी के बाद औरत को कितनी भेदात्‍मक प्रक्रयाा से गुजरना पडता है जो शायद किसी युद्ध में भी न हो।

                      विश्‍लेषण कहें या परीक्षण बस एक बात सामने आती हैकि सबके अपने  विचार हैं अपनी भावनाऐं हैं तर्क है। प्रेम निषेधात्‍मक होते हुए भी द्रड है गतिमान है इसी पर सौंदर्य है। बस ऐसा होता हैकि आज प्रेम को दूषित बना दिया गया है तो कोई एक दिन प्रेम को सर्मपित हो नहीं सकता। जब अपने देश को देखते हैं तो प्रेम का पर्याय ही दिखता है ।अविवाहित नेताओं की ओर देखते हें तब लगता है नेताओं को अविवाहित ही होना चाहिए। ताकि देश की प्रगति यकीनन आगे बढ सके। जब आंखो में देश प्रेम की छवी हो तो बाकी सारे प्रेम गौण हो जाते हैं ।एक सवाल वही है कंवारे पन का जो वास्‍तव में सही है या गलत यह निष्‍कर्ष तौर पर तो कहा नहीं जा सकता किन्‍तु हर द्रष्टि से कंवारा पन प्रेममय हो तो अच्‍छा है बेहतर है उस विवाहित जिन्‍गी से जो बोझ है।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें