शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011



beto ki befai


बेटों की बेवफाई
प्रभा जैन
क्‍यूं बांट रहे हो मरे अस्तित्‍व को
मरे प्‍यार को मेरे वजूद को
क्‍या तुम्‍हें ख्‍याल नहीं
क्‍या मरा हाल है
दिल पल पल हो रहा बेहाल है
क्‍यूं सदियों से
वही लोहा पीट रहे हो
मरे वजूद को घसीट रहे हो
मरा मन बिखरता है
तार तार होकर अखरता है
बेबसी में वो
तडपकर चीखता है रोता है
नहीं जानते तुम मेरी तन्‍हाई को
मजाक बना दिया
मरी खामोशी को
सारी कायनात मिलकर भी
मरे पिघलते हुए आंसुओं की
टीस नहीं समझ सकते।
क्‍या कभी कोइ्र बेटा
जान या समझ पायेगा
मरी जगहंसाई को।
आंसुओं से किताबें नहीं लिखी जाती
जिन्‍दगी कागज की लिखई नहीं होती।
बंदूक की गोली
हर लेती है जिन्‍दगी
क्‍या कोई रोक सकेगा
इतिहास की गवाही को।
जीवन में कई तूफान
अभी आने बाकी हैं
एक की लाश
दूजे की जिन्‍दगानी है
मौत के सौदागरों ने---
मिलकर हस्‍ती मिटा घली
क्‍या मां भूला पायेगी
बेटों की बेवफाई को।
प्रभा जैन
16(311 शास्‍त्री नगर
खटोदरा कालोनी सूरत-2
9723544153



re panchi


रे पंछी तू क्‍यों उडता है
प्रभा जैन
र्घणा का बांध मन को
रिश्‍तों से भेद रहा
जो अपने थे अपनों को ही लील रहा
सागर छलक कर मिटट्री से
बने घर को तोड रहा
निश्‍चल वो मिटट्री
स्‍वंय को फिर तैयारकर लेती है
किसी और घर के निमार्ण में।
नन्‍हां स पौधा
अपने ही पतों सेलिपटा
आनंदित होकर पेड बन रहा।
मन की कटुता तेज धार ज्‍यों
व्‍यवहार मे कालिमा बन
कलंकित अंधकार बन
शब्‍दों के डंक मार रहा।
मन पंछी बन
गगन में लम्‍बी उडान
भरता जाता है
छोटा सा तन मन के भेद
न पाकर बेसुध हो जाता है।
नन्‍हीं देह को मन के जाले
धेरते जाते हैं
हजारों चाबुक में
नंगी देह घायल हो जाती है
क्‍यूं मन पंछी बन जाता है
रे पंछी तु क्‍यूं उडता है।
16(311 शास्‍त्री नगर
  

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

manusya ak sochnewalaprani hai


मनुष्‍य एक सोचने वाला प्राणी है
                            प्रभा जैन
सोचना आम प्रक्रया है।मनुष्‍य जाती के सब लोग सोचते हैं ।दूध पीता बच्‍चा भी सोचता है।स्‍कूल जाने वाला विधार्थी भी सोचता है।सोच का इतना दोहन होता है कि सोच स्‍वंय सेाच में पड जाती है। व्‍यवहारिक ज्ञान को सोच कर परिक्षा उर्तीण करना आम बात नहीं वो प्रशसनीय है कामयाबी है।

         घर में महिला भी सोचती है।खाना बनाने से लेकर दूध सब्‍जी बाजार से कब कैसेट लाना है उसे भी सोच की कार्यपेटी में रखा गया है। बच्‍चे को स्‍कूल भेजना है ड्रेस को आईरन करनी है टिफिन बोटल तैयार करना है। यह सब बिना सोचे कैसेट संभव है ।परिपोषित संस्‍क्रति में सोच की अपनी अवस्‍था हैजिसे निर्वाह के तौर पर शिक्षित किया जा सकता है।कालखण्‍ड का कोई भी अध्‍याय सोच की गणित पर चुनौतीपूर्ण जोड घटाव लिखने में कामयाबी हासिल कर सकता है।

            कुछ लोगों की सोच तो ऐसी पुरस्‍क्रत सफलता है जिस पर भाषण गढे जा सकते हैं।दार्शनिकों वैज्ञानिकों की सोच पर सफल जिन्‍दगी का शक्ति शाली हासिल आयाम तय किया गया है। उन्‍हीं के तार्किक अध्‍यनों में निवेश की प्रतिराशी संलंग्‍न होकर मनोविज्ञान के धूमिल दायरे में बंद नजर आती है। सदगुणेां का समावेश्‍ किसी भी आधार पर व्‍यक्तिगत राय देने में महारथ सिद्ध है। सिद्ध पुरूष की सोच की छैनी जब वचन बद्धता पर आरूढ होकर अति आधुनिक विचारों की गुणवता को साबित करने पर उतारू हो जायेगा तब मनुष्‍य की प्रक्रिति पर प्रहार होना आवश्‍यक हो जाता है कि क्‍या वास्‍तव में वो सोचने वाला प्राणी है।

            वादकों व अनुवादकों को पीपल के पते पर अपना धैर्य छपवाने की दोहरी मांग संभवतया करनी होती है। सडक पर पैदल चलिए या कार की सवारी करें। जरूरी है नैतिकता को बनाये रखने की। मुख में पान चबाने की सामान्‍य प्रक्रिया पर क्‍या व क्‍युंकर सवाल उठे। अपने पैसे से हम कुछ भी सेवन कर सकते हैं। पान की पीक सरकारी खाते की जमीन पर इत उत गिराकर गंदगी को न्‍योता देना भी सही है क्‍योंकि यदि वे थूकेगें नहीं तो म्‍यूनिसीपालिटी वालों के काम कम न हों जायें। गरीब मजदूरों को सफाई करने के कुछ पैसे घर  चलाने के लिए कहां से प्राप्‍त होंगे। बच्‍चों के हाथों में जंक फूड देकर उनकी करारी भूख क्‍यों न शांत करें रेपर ही तो फेंका है। सरकार के हाथ में भी काम की कुछ लकीर तो डालनी ही पड्रेगी ।दिन भर गंदगी फैलाते मनुष्‍य प्रजाती के सोचनीय प्राणी को क्‍या पता ठिठुरती ठंडी रात में भी मजदूर के हिस्‍से सिर्फ आपकी गंदगी साफ करनी आती है। उन्‍हें मुलायम नर्म गददे व रजाई नहीं मिलती ।सुबह का चुल्‍हा जले इसके लिए रातभर सोचनीय कार्य को अंजाम तक पहुंचाना होता है। अनैतिक कारणों का दोषी लेक्‍चरों की  दुनिया का बादशाह बनकर शब्‍दों के मार्मिक जाल से असफल उपलब्‍धियों को अपनी सोच की दिशा से अनभिज्ञ परिस्थितियों को स्‍वेच्‍छानुसार आयाम देने की कोशिश्‍ करता है। आप गारंटी के साथ उनके होकर चलिए कुछ ही महिनों में आपकी सोच का ब्रेन वाश्‍ हो जायेगा और आप ग्रहस्‍थ की हर समस्‍या से मुक्‍त होकर या तो अपनी तिजोरी का मुख उनकी तरुफ खोल देंगे या उन्‍हीं के हवाले राम नाम सत्‍य की श्रेणी में अपना नाम दर्ज करवा चूके होंगें ।स्‍वसंतुस्‍टी से काम बनाने की हर मुमकिन कोशिश्‍ को प्रसिद्धि के लिए मीडिया टायकून का कंधा बिना मांगे ही मिल जाता है।

               सहेजकर सोचकर सोचनीय अवस्‍था को क्‍या मनुज सोच पाने की स्थिति में है। वो सोचकर भी सोच नहीं पाता या उसकी सोच दयनीय व विचारनीय होकर गमगीन हो चली है1 ऐसी आदरणीय सोच का तो सदियों तक इलाज भी चलता रहेगा तब भी सोच की सोचनीय अवस्‍था को मुक्ति असंभव है। हम निकलते हैं उनकी तलाश में जो अपनी सोच को वैधानिक पुष्टि पर आम व्‍यक्ति की निखरती जिंदगी में लागू करें। देखते हैं तलाश जारी है उस एक सोच की जिसके लिए हमने आपने व सबने सोचकर भी सोचना बंद कर दिया। सोच को हमें फिर से पुष्‍टी देनी है। कि क्‍या वास्‍तव में मनुष्‍य एक चिंतनशील प्राणी की भूमिका में आराम से आ सकता है या उसके चिंतन को दीमक लग गया है। सेाचनीय अवस्‍था का जरिया किस सोच से प्राप्‍त होगा। अधेडबुन की किसी भी अवस्‍था में आप और हम सोचना चालू रख सकते हैं। बशर्ते कि वो कोई खजाने से निकली हुई कोई गहरी सोच हो जिसका प्ररूपण करने मनन करने सोच को भी सोचना 

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

ak sawal kanwarepan ka lekh


एक सवाल कंवारेपन का
प्रभा जैन
प्रेम ढाई अक्षरों से बना जरूर है किन्‍तु इस शब्‍द की कोइ्र भाषा या परिभाषा ही नहीं होती। प्रेम स्‍वंय में पूर्ण होता है यह कब होता है।किससे होता है ।क्‍यूं होता है।समझ से परे है।इंसान उसे महसूस कर सकते हैं पर इसकी गहराई को हर मनुष्‍य समझ ही नहीं पाते। प्रेम आज मात्र एक अभिव्‍यकित बन कर रह गया है किन्‍तु उस अहसास को महसूस करने की क्षमता खामोश हो गयी है। समस्‍या का समाधान मात्र प्रेम है। प्रेम जीवन का समर्पण है जहां चाह नहीं होती पाने की सिर्फ देने के अहसास से प्रेम परिपूर्ण होता है। प्रेम मूक संवेदना है जो मौन आंखो के सहारे कब दिल तक पहुंचता है पता ही नहीं चलता।
                     प्रेम में प्रेमी की अंतिम मंजिल शादी तय कर दी गयी है।कुछ तो समाज के सारे बंधन तोड कर विवाह के सूत्र में बंधने के लिए घर से भा्र कर शादी कर लेते हैं। कहा जाता है कि प्‍यार किया तो डरना क्‍या परन्‍तु जब प्रेम होता है तो दूनिया से बेखबरी भले हो मन का कोना डरता है कि साथी बदनाम न हो जाये। प्रेम सांसो से उतर कर धडकन से रूह तक का सफर तय करता है तब कहीं जा कर रोम रोम में प्रेम की धारा बहती है।दिल की चाह होने लगती है कि अपने प्‍यार के पास रहे उसकी बाहों में पनाहो में जहां न दर्द सताये न कोई परेशानी ।प्रेम के होने में आंखो ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। दुनिया में इंसान ने तरक्‍की तो काफी कर ली परन्‍तु प्रेम के क्षेत्र में उसकी मानसिकता काफी संकीर्ण है क्रष्‍ण राधा के प्रेम को पूजेगें किन्‍तु उनके घर में यदि किसी ने प्रेम कर लिया तो सहनशक्ति की सारी हदें खत्‍म। हमारे समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जो विवाह किये बिना ही अपना जीवन जी रहे हैं। अविवाहित होन के कई कारण सामने आते हैं दाम्‍पत्‍य जीवन में कई बार ऐसा होता है कि दायित्‍व तले भावनाऐं दबकर दम तोड देती है।प्रेम की निष्‍पति या उत्‍पति तो संभवत: सामने वालों की समझ पर टिका है। क्‍या विवाहित व्‍यक्ति का संम्‍पूर्ण जीवन प्रेम मय होता है वादों कसमों को ही प्रेम का नाम देकर व्‍यवस्‍था को बनाये रखने में अपनी भूमिका रखते हैं। कई कहते हैं सच्‍चा प्‍यार मिले तो किसी भी उम्र में किया जाना चाहिए। प्रेम कोई शर्त नहीं व्‍यवस्‍था नहीं किन्‍तु विवाह शर्त और व्‍यवस्‍था है। इश्‍वर के कणकण में होने का अहसास होता है तो प्रेम भीकहीं भी पैदा होने का हक रखता है।राकेश कहता है कि प्‍यार एक खुमार है मैं जिससे प्रेम करता था उसके घरवालों ने उसकी शादी किसी और से कर दी पर मरा प्‍यार तो खत्‍म नहीं हुआ।जिस प्रकार ईश्‍वर को अनेक लोग चाहते हैं मानते हैं वैसे ही मैं भी चाहता हूं उसे वो किसी और की हो गयी ये सोच कर खत्‍म हो जायेगा मेरा प्‍यार तो क्‍या किया प्‍यार मैनें। उसकी यादों के सहारे पूरी जिन्‍दगी जी लुंगा। जीवन का कहना है कि अविवाहित हूं कुछ जरूरतें भी होती हे लेकिन जब वो ऐक्‍सीडेन्‍ट में चली गयी मुझे अकेला छोडकर तब से कोई ओर दिल को भाई ही नहीं। रागिनी की यादों का साथ काफी है। क्‍या ऐसे प्रेम का कोई सानी हो सकता है। रोमा कहती है जब पहली बार प्‍यार किया तो घरवालों ने मिलने नहीं दिया शादी के बाद पति से प्‍यार मिला नहीं ।पति के दोस्‍त से प्‍यार किया तो वो भी छोड गया अपनी मजबूरियों के साथ। फिर कोई और दिल को अच्‍छा लगने लगा तो उससे प्‍यार कर बैठी उसका ख्‍याल रखना अच्‍छा लगता है ।शादी शुदा होने के कारण अपनी मर्यादा को जानती हूं पर मन गर किसी को चाहे तो क्‍या कसूर। प्रेम ही तो है मन को सुकुन मिलता है कि कोई अपना है। हां ये सच है कि पहला प्‍यार नहीं मिलता ।मगर कभी भी अपना कोई दिल समझता है तो प्रेम अहसास बनकर जी उठता है।
                    रवि कहता है प्रेम कोई परी के आंचल पे लिखी कविता हैऐसी परी जिसे देखते ही प्‍यार हो जाये। पर न परी मिली न मौका ।घर में बडा होने के कारण जिम्‍मेदारियों से ही शादी कर ली अब अविवाहित होने का बस अफसोस भर होता है1रंजीत कहता है 7भाई बहन में सबसे छोटा था मां  पिता के मरने के बाद किसी ने ध्‍यान न दिया और अब उम्र हो गयी ।कोई मिली नहीं। बस रह गया कंवारा। राहुल का कथन है लडकियां आजकल है ही कहां सब पढी लिखी हो गयी है उनको उसी के लायक लडका चाहिए। कम पढे लडके रह जाते है कंवारे। दक्षा कहती है शादी करने से अच्‍छा है किसी की हत्‍या करके कंवारा रहना। ये शादी शुदा की राय हे शादी के बाद सिर्फ जिम्‍मदारी हेाती है प्रेम नहीं।प्रेम शून्‍य जीवन का कोई अस्तित्‍व नहीं रहता। रूनी कहती है प्रेम पुरूष से करना ही नहीं चाहिए।पुरूष प्रेम को समझना ही नहीं चाहता उसके लिए नारी सिर्फ भेग की वस्‍तु है। पुरूष क्रूर है चाहे पिता हो पति हो बेटा हेा या प्रेमी। मद्रों को प्रेम करना आता ही नहीं। जहां देह का प्रश्‍न है वहां पुरूष की नजर में प्रेम होता है अन्‍यथा जब दर्द मे उसके कंधे पे सिर रखना चाहें जो झटक देते हैं।क्रूर पुरूष से प्रेम करने के बजाय किसी पशु से या फूल से प्रेम करे तो प्रेम में अहसास मिलता हे। अविवाहित रहना अच्‍छा है किसी पुरूष को पति रूप देकर प्रेम में हारना। वरना प्राक्रतिक संपदाये क्‍या कम हैप्रेम करने के लिए । प्रीति कहती है प्रेम धरती के अंदर की वो भावना है जो सदा ही अंकुरित होकर खिलती है महकती है जीती है। फिर शादी ---- नहीं प्रेम सिर्फ प्रेम हैशादी उसका पडाव नहीं वो तो अंतिम छोर है।मैं तो अभी जीना चाहती हूं मेरा प्रेमी भी मेरे साथ जीता है। हम अविवाहित रहकर ही प्रेम को प्राप्‍त कर सकते हैं।जहां न बंधन है न ही दायित्‍व। रेशमी कहती है मैनें सदा ही मर्दों को कुचलते देखा है औरतों के जज्‍बातों को उनकी खुशियों को सदेव ही रोंदा है।क्रूरता की हर सीमा पार कर दी मर्दों ने।उनके नाम से ही घ्रणा के भाव मन को घेर लेते हें। अरूणा के अनुसार प्रेम मरीचिका है खुबसुरत धोखा है। शादी के बाद औरत को कितनी भेदात्‍मक प्रक्रयाा से गुजरना पडता है जो शायद किसी युद्ध में भी न हो।

                      विश्‍लेषण कहें या परीक्षण बस एक बात सामने आती हैकि सबके अपने  विचार हैं अपनी भावनाऐं हैं तर्क है। प्रेम निषेधात्‍मक होते हुए भी द्रड है गतिमान है इसी पर सौंदर्य है। बस ऐसा होता हैकि आज प्रेम को दूषित बना दिया गया है तो कोई एक दिन प्रेम को सर्मपित हो नहीं सकता। जब अपने देश को देखते हैं तो प्रेम का पर्याय ही दिखता है ।अविवाहित नेताओं की ओर देखते हें तब लगता है नेताओं को अविवाहित ही होना चाहिए। ताकि देश की प्रगति यकीनन आगे बढ सके। जब आंखो में देश प्रेम की छवी हो तो बाकी सारे प्रेम गौण हो जाते हैं ।एक सवाल वही है कंवारे पन का जो वास्‍तव में सही है या गलत यह निष्‍कर्ष तौर पर तो कहा नहीं जा सकता किन्‍तु हर द्रष्टि से कंवारा पन प्रेममय हो तो अच्‍छा है बेहतर है उस विवाहित जिन्‍गी से जो बोझ है।  

prem may sawal


                               प्रेममय सवाल
                                                                    प्रभा जैन
मिले जुले भावों का परिसीमन प्रेम हो नहीं सकता। प्रेम करने के लिए शुद्ध भावों की आवश्‍यकता है शुद्ध भाव मिल भी जायेगा तो क्‍या प्रेम के लिए शुद्ध पात्र भी तो चाहिए। शुद्ध पात्र में शुद्ध भाव किस कदर टिक सकते हैं ये भी तो सवाल है। सवालों के पास तो एक सवाल अब भी है----
            शुद्ध प्रेम के लिए शुद्ध लडकी या लडका भी तो शुद्ध चाहिए अब उनकी शुद्धता किस आधर पर किस पेरामिटर से नापा जायेगा। क्‍या शुद्धता का पैमाना किसी सात्‍विक भाव से संत्रास्‍त होकर किसी की शु8िकरण के लिए कुछ कर सकने में महारथ हासिल कर सकता है। प्रेम के लिए पात्रता का विकास करना जितना आवश्‍यक माना गया है उतना ही उसकी स्‍वच्‍छता पर ध्‍यान देना भी आवश्‍यक अंग बन गया है। एक पल के भाव क्‍या वाकई पूरी जिन्‍दगी तक कायम पह सकते हैं। या उन भावों को समय समय पर संवेदनात्‍मक क्रिया प्रतिक्रिया की कसौटी पर चढ जाना चाहिए। बदलाव व बहलाव के इस मौसम में बहकाव व भटकाव की स्थिति की यथावत बनी रहती है। ऐसी गंभीर परिस्थितियों से जूझने के लिए ठहराव की अत्‍यंत आवश्‍यकता होती है। गर किसी के पास ठहराव का पात्र न हो तो बाकी स्थितियां गंभीर से गभीर बनकर छिटक लेगी। दोषारोपण बेवफाई का होगा सो अलग। क्‍यूंकर ऐसी स्थितियों को जन्‍म मिले।
                  यंत्रणा व मंत्रणा किसी संभवत: जानकारी पर किया जा सकता है। त्रासदी तो मंत्रणा की है कि जो होती ही नहीं । अमूमन फैसला एकतरफा कर दिया जाता है। एक अकेला पात्र दोषी करार दिया गया और काल कोठरी की यंत्रण में घुटन व सिलन की जिन्‍दगी को बसर करने के लिए मजबूर कर दिया गया। मंत्रणा दोनों तरफ  से हो भी जायेगा तो क्‍या अहम पर ठोस पहुंचने की गुंजाईश न होगी। क्‍यूंकर इन स्थितियों का सामना अकेला एक पात्र झेलता है।
                  भाव शून्‍य कगार पर मरघट का वास होता है ये तो तय होगया। अब बात फिर शुद्धता की लें तो क्‍या बुराई है। शुद्ध पात्र शुद्ध दानी शुद्ध भाव शुद्ध विचार सभी शुद्ध तो अशुद्धी कहां से आयी। क्‍या विचार और भाव वक्‍त की झंझावतों में फंसकर बदल गये। अथवा सहनशकित का दायरा संकुचित हो गया। एक बात ओर आती है प्रेम के परिहास में नवीनता के मुखौटे के पीछे कई राज दफन होते हैं । धीरे धीरे पुरात्‍व का खजाना ज्‍वार ले आता है।जो शुरूवाती दौर में अच्‍छे लहजे में चल रहा होता है वही अब बेरूखी का आर होने लगा है। जो अदायें मदहोशी व बेहोश्‍ करने वाली मानी जाती थी वही बचकानी व बेफकूफी के लहजे में शामिल हो गयी है। बातों का सिलसिला रस घेाला करता था या दवा के रूप में काम लिया जाता था अब वही शुद्ध पात्र अशुद्ध हो गया है जहर का काम करने लगा है। अम्रत वचनों का जहरीले वाणें में परिवर्तित होता देख प्रेम का हुजुम स्‍वंय शर्मशार है। शर्मनाक लहजे को किस पात्र की शुद्धता का उदाहरण दिया जाय । आंचलिक स्थितियों का जमावडा किसी चौपाल या नुक्‍कउ पर जमघट नहीं लगाता उससे आगे किसी ओर के दामन में गिरकर स्‍वंय को सरोबार करता है।
                  भीगे दामन पर कालिख के छींटे भी नजर के टीके का काम करती है। भंवरे की तरह फुलों की मासूमियत चुराना अब शुद्ध पात्र का आवरण बन गया है। भावों का दायरा किस कोने से किस कोने तक अपने भाव प्रदर्शित कर सकने में महारथ्‍ हासिल करता है ये तो वक्‍त तय करेगा । त्रप्‍त प्रेम की पवित्रता शुद्धता की कसौटी पर ताउम्र खरी उतरती है। आंतरिक प्रेम की कशिश अंतत* बनी रहती है वरना वहीं समझोते की दीवार भी जल्‍दी बन जाने में अपने आप को साबित करने में लगी रहती है। लगाव का भेद आज पात्र की पात्रता पर नहीं कसा जा सकता। हालातों के हत्‍थे चएकर गलत फहमियों के हवाले होता है। वहां भावनाएं खत्‍म और अहम्र की पदवी उँची हो जाती है।
                  प्रेम का पात्र आज भी सच्‍चे प्रेम के इंतजार में अपने आप को दोषी माने अश्रु बहा रहा है। विनती करता है पर क्‍या माफी भी मिल पायेगी उसे। सूली पर लटका वो प्रेम कराह रहा है जिसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं । अब रहमत और प्रेम का हुजुम किस कदर अपने लिए पात्र को शुद्ध कर पाता है। ये भी प्रेम मय सवाल है।
प्रभा जैन
16;)311 शास्‍त्री नगर
खटोदराकालोनी
सूरत-2
9723544153